Transcription

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Transcription

The Process Of Transcription

Transcription 

इस प्रकार, genetic code का निर्धारण तो nucleus में स्थित genes के DNA में होता है परन्तु protein synthesis की प्रक्रिया तो cytoplasm में स्थित ribosomes में होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि DNA से मिले genetic code को nuclear DNA से प्राप्त करके cytoplasmic robosomes तक पहुँचाना होगा। इसके लिए DNA के nitrogenous bases के क्रम की हूबहू कॉपी RNA के रूप में तैयार की जाती है। इस प्रक्रिया को transcription कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है, किसी मौखिक सूचना का लिखित रूप। Enzyme RNA polymerase इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  यह प्रक्रिया निम्न प्रकार से संपन्न होती है।  

  • जिस gene का transcription होना है, DNA strand पर उसके ठीक पहले लगे भाग को promotor कहते हैं। Transcription की प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए RNA polymerase सर्वप्रथम इससे ही जुड़ जाता है। 
  • यह RNA polymerase किसी jipper chain के slider की भांति कार्य करता है। Promotor से जुड़ने के बाद यह DNA helix के दोनों strands को दो turns तक खोलकर एक दूसरे से अलग कर देता है जिससे दोनों strands के मध्य स्थित nitrogenous bases प्रकट हो जाते हैं। 
  • इन्हीं nitrogenous bases को साँचा (templet) बनाकर उसकी कॉपी के रूप में RNA का निर्माण किया जाता है जिसमें DNA के triplet code से RNA के complementary triplet code या codon का निर्माण किया जाता है। ध्यान रहे, यह complementary (वास्तविक वस्तु के अनुसार निर्मित या जोड़ा बनाने वाली पूरक) copy है कि complimentary (मुफ्त) copy तुम जानते ही हो कि purine base adenine (A) हमेशा pyrimidine base thymine (T) से जुड़ता है तथा purine base guanine (G) हमेशा pyrimidine base cytosine (C) से। इसी के अनुसार triplet GGA की complementary copy के रूप में CCT का निर्माण होगा। क्योंकि RNA में pyrimidine base thymine के स्थान पर uracil (U) होता है अतः यह CCU के रूप में निर्मित होता है। 
  • इस प्रकार, DNA के nucleotides (nitrogenous base + deoxyribose sugar + phosphate) के सामने उसके complementary RNA nucleotides (nitrogenous base + ribose sugar + phosphate) एकत्रित होते जाते हैं। RNA polymerase इन nucleotides को DNA के nucleotides से hydrogen bonds के माध्यम से जोड़ देता है। इस bonding के लिए अधिक energy की आवश्यकता नहीं होती। 
  • अगले चरण में इस नए nucleotide को RNA chain के nucleotides से जोड़ना है जो covalent bond से जुड़ते हैं। इस bond को बनाने के लिए बड़ी मात्रा में energy की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए, RNA polymerase में इन nucleotides में 2 अतिरिक्त phosphate radicals जोड़कर उन्हें activate करता जाता है जिसकी energy से वह RNA chain के nucleotides से जुड़ सकें। इस प्रक्रिया को RNA nucleotides का activaton कहते हैं। 
  • जैसे-जैसे RNA polymerase, DNA पर आगे बढ़ता जाता है, वह नए-नए RNA nucleotides को chain में जोड़ता जाता है। इस प्रकार से RNA chain लम्बी होती चली जाती है। इस प्रकार से RNA chain लम्बी होती चली जाती है।
  • जिस प्रकार किसी gene के आरम्भ में promotor sequence होता है जिससे transcription की प्रक्रिया आरम्भ होती है, ठीक उसी प्रकार इसके अंत में chain terminating sequence भी होता है जहाँ पहुंचकर transcription की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। इसके बाद, RNA polymerase एवं नयी बनी RNA chain, DNA से अलग हो जाते हैं। RNA polymerase दोबारा नए transcription के लिए प्रयुक्त हो जाता है, DNA strands दोबारा आपस में जुड़कर helix बना लेते हैं तथा एक नई single stranded RNA chain, protein synthesis कराने के लिए तैयार हो जाती है। 
  • वास्तव में इस chain में वांछित gene के transcript के आगे-पीछे के कुछ अतिरिक्त nucleotides भी लग जाते हैं। इसीलिए इसे precursor RNA (pre-RNA) कहते हैं। Nucleotide chain का यह अतिरिक्त भाग intron कहलाता है जबकि gene के जितने भाग के transcript की वास्तव में आवश्यकता होती है वह exon कहलाता है। Protein synthesis के लिए आवश्यक complementary triplet code या codons इसी exon में रहते हैं। Nucleus में ही उपस्थित small nuclear RNA (snRNA) इस pre-RNA में से intron को हटाकर केवल exon के रूप में mature RNA को उत्पन्न करता है। 
  • इस प्रकार complementary copy के रूप में बना mature RNA, protein synthesis की सम्पूर्ण सूचना DNA से लेकर ribosomes तक जाता है जिसके कारण इसे messenger RNA (mRNA) कहते हैं। 

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Dr. Pankaj Kumar Agarwal

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